Thursday, August 27, 2009

गुस्ताखी माफ़

कहते है कि घोड़े के पिछाड़ी और हाकिम के अगाड़ी रहने वालो के साथ कभी भी कुछ हो सकता है।लेकिन आज तो मजबूरी ये हो गई कि उनके पीछे चलना पड़ रहा है जो घोड़े तो क्या गधे से भी गये गुज़रे लगते हैं।और फिर हाकिम यानि सरकारी तंत्र का तो कहना ही क्या उसके आगे चलने की तो वैसे भी मजबूरी हो गई है।लगता है हर वक्त हमे भीड़ तंत्र की तर्ज़ पर हांकने को बेचैन रहता है वो भी कई तरह के चाबुक हाथ में लिए।एक जमाने में कभी जो लोग पत्रकारो को की गंध लेकर रातो को अपनी नींद हराम कर लिया करते थे।जिनके सामने अगर पत्रकार जाते तो उनके हलक़ का पानी सूख जाता था।पत्रकार उनकी एक फोटो लेने या महज़ एक बाइट लेने को तरसते थे।आज वही माफिया माफ करना ज़ुबान फिसल गई वही सफेदपोश अब पत्रकारो को नौकरी का पिटारा नज़र आने लगे हैं।कई चैनल और मीडिया हाउसो के बाहर पत्रकार उन्ही लोगों की एक झलक पाने को बेचैन हैं जिनके काले कारनामे छापने को कभी उतावले रहते थे।और रहा हाकिम का सवाल तो उसने भी जैसे ठान ही ली है कि लाइंसेस तो उसे ही देना है जिसके ऊपर जितने ज्यादा मामले दर्ज होंगे।कई चैनलो के मालिको के बारे में तो पुलिस भी रिकार्ड रखते रखते थक सी गई है।मगर वही पुलिस उनके दर के बाहर चौकीदारी के फर्ज़ को बख़ूबी अंजाम दे रही है।और इस पूरे खेल में किसके हाथ क्या लगा ये तो अलग बात है, मगर कलम के सिपाही यानि पत्रकारो के लिए शहीद होने या फिर आत्महत्या करने के अलावा कुछ ज्यादा विकल्प बचे नहीं हैं।कल तक जिनकी पंच लाइन थी कि हम ख़बर है आज यकीनन वो ही ख़बर हैं,उनके चैनल के बाहर कबी पुलिस तो कभी लेनदारो की भीड़ जमा रहती है, ये अलग बात थी कि अगर उनको चैनल का लाइंसेस देने से पहले ठीक से जांच हो जाती तो सरकार पर ये आरोप न लगते कि जिस पर थानो में इतने मामले दर्ज थे उसको ही लाइंसेस क्यो दे दिया।गये जमाने में जिनके कारनमे खबरो की सुरखियां रहते थे आज वो मीडिया हाउस के मालिक बन चुके हैं।पत्रकारो सावधान क्योकि बहुत कठिन है डगर पंनघट की।

"ये दस्तूर-ए-ज़बाँ बंदी है कैसा तेरी महफिल में यहां तो बात करने को भी तरसती है ज़ुबाँ मेरी"।

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