Tuesday, December 29, 2009

Check out Opposition News :: News in Hindi, Latest Hindi News India & World News

Title: Opposition News :: News in Hindi, Latest Hindi News India & World News

Link: http://gotaf.socialtwist.com/redirect?l=-105497112804224035311

जीत का जलूस बनाम दर्द का सफर

इसांफ की लड़ाई लड़ो जीत के बाद की नहीं.....!
उन्नीस साल पहले एक पुलिस ऑफिसर के हाथों एक नाबालिग़ लड़की की इज़्ज़त से इस क़दर खिलवाड़ किया गया कि उसने ज़िंदगी के मुक़ाबले में मौत को गले लगा लिया। पूरा परिवार बिखर गया। जिस लड़की को वो दुनियां के सामने रौशन चिराग़ की तरह देखने का ख्वाब पाल रहे थे। उसी लड़की की ज़िदगी इस क़दर दाग़दार बना दी गई कि इलाक़े में रहना भी दुश्वार हो गया। फिर आरोपी पुलिस ऑफिसर राजनीतिक आक़ाओं की मदद से सज़ा की बजाए प्रमोशन के ईनाम पाकर ताकत के नशे इतना मदहोश हुआ कि उसने पीड़ित परिवार का जीना ही मुहाल कर दिया।अपने गुंडो को भेज कर परिवार को इतना तंग कराया कि परिवार मुंह छिपाकर अपनी तमाम जायदाद औनेपौने बेच कर कहीं गुमनाम हो गया। उस वक़्त इस परिवार को किसी मीडिया ने ठूंडा न तो किसी एनजीओ ने ही मदद की, न ही महिला आयोग का बयान आया। परिवार के पास कुछ नही था। लेकिन उसके पास वो था जो किसी भी कामयाबी की ज़मानत बन सकता है। एक अच्छा और हमदर्द दोस्त, खुद का आत्मविश्वास और दिल की लगी। जी हां हम बात कर रहे हैं, हरियाणा के पूर्व बेशर्म डीजीपी राठौड़ के हाथों 14 साल की उभरती हुई टेनिस खिलाड़ी रुचिका गहरौत्रा की मौत की। राठौड़ ने वो सब किया जो किसी भी इज्ज़त दार को खुदकशी पर मजबूर कर सकता है।और रुचिका ने भी वही किया जो उस वक्त का मीडिया चाहता था, राजशाही चाहती थी, एनजीओ चाहते थे, समाज सेवी चाहते थे, महिला आयोग चाहता था, और राठौड़ चाहता था। जी हां हमेशा की तरह ये तमाम लोग ताकतवर के साथ थे। रुचिका कमजोर सी नाबालिग लड़की थी। बिन मां की बेटी थी। इस लिए खड़े होने के नाम पर तथाकथित मददगारों ने दामन थामा राठोड़ का। डीजीपी था, नेताओं और सीएम का चेहता था। लेकिन माता पिता के लिए ये सब बेमानी था। बेटी की मौत से ज़्यादा उसकी बेबसी दिल को लगी थी। वो लड़ते रहे अकेले रुचिका की दोस्त अराधना को हज़ारो सलाम उनकी दोस्ती को सैल्यूट, वो खड़ी रही लड़ती रही और पूरे उन्नीस साल बाद आया वो दिन जब पासा पलट गया। अदालत ने साबित कर दिया कि दोषी कितना ही ताकत वर क्यों न हो कानून अपना काम ज़रूर करता है। लड़ने वाला हो तो जीत भी होती है। जी हां पासा पलट गया। राठौड़ दोषी साबित हो गये। रुचिका की दोस्त और उसका परिवार ताकतवर साबित हुए। रातो रात उन सब लोगों ने पाला बदल दिया जो अब तक राठौड़ के साथ न होते हुए भी रुचिका के परिवार के साथ नहीं थे। कभी जिन लोगों ने रुचिका के गुमनाम परिवार की मदद की नहीं सोची, वो भी जुबान खोलने लगे। सिर्फ इसलिए कि रुचिका और राठौड़ की लड़ाई में रुचिका के परिवार को बढत मिल गई। अदालत ने कमजोर को ताकत बख्श दी इंसाफ की आत्मा को जिंदा रखा। जी हां जो जीता वही सिंकदर, जब राठौड़ मज़बूत तो मददगार पाले के इस तरफ और जब कमज़ोर तो पाले के उस तरफ। खैर इस वक्त हमारा न तो ये मक़सद है कि उन लोगों को क्रिटिसाइज करें जो अब बढ़ चढ़ कर हमदर्दी की आड़ में टीआरपी और ख़बरो का गेम बजा रहे हैं। न ही हम ये कह रहे हैं कि जो ख़बर आज 2009 में है वो 2008 में भी थी, 2007 में भी थी, और 2006 से लेकर उस दिन तक थी जिस दिन रुचिका के साथ पहली बार ताकत ने घिनौना मजाक किया था। हांलाकि खोजी पत्रकार तब भी थे और आज भी, एनजीओ तब भी थे, आज भी। पूर्व डीजीपी आरआर सिहं ने जो जांच की थी वो बाइट पहले भी लाई जा सकती थी। पूर्व डीजीपी आरआर सिंह का कहना आप भी सुन सकते हैं कि उन्होने जो जांच की थी उसमे राठौड़ के खिलाफ रिपोर्ट पेश कर दी थी। यानि उन्नीस साल पहले जो कुछ सुनाना था वो अदालत के फैसले के बाद सुनया तो क्या सुनाया ? हमारा बस एक ही मक़सद है कि जब जागो तभी सवेरा। आज भी बहुत ऐसे मामले हैं जिनमे पीड़ित को इंसाफ नहीं मिल रहा और ताकतवर अपना खेल खेल रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम सिर्फ उसी दिन का इंतजार करते रह जाएं जब ताकत वर कमजोर हो और कमजोर ताकतवर। लेकिन अगर ताकत और बेज़ुबान की जंग में कमज़ोर हार गया तो उसकी सारी जिम्मेदारी हम पर ही होगी।साथ ही रुचिका के मामले में महज़ छेड़छाड़ के बजाए सीधा हत्या का मामला दर्ज होन चाहिए, न कि आत्महत्या के लिए उकसाने का। और इस सबसे अहम जांच ये होनी चाहिए कि राठौड़ ने जिन नेताओं की छत्रछाया में खुद को बचाए रखा, उसके एवज़ उन नेताओं के कितने काले कारनामों में मदद पहुचाईं। यानि राठौड़ के कार्यकाल की पूरी जांच होनी चाहिए।
अपोज़िशनन्यूज़ डॉट कॉम http://oppositionnews.com/

जीत का जलूस बनाम मातम का सफर

रुचिका की महाभारत में चीर हरण के आधूनिक तमाशाई
सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डॉयरेक्टर आरएम सिहं ने बताया कि रुचिका मामले की जांच के दौरान आरोपी डीजीपी राठौड़ ने अपने प्रभाव के बल पर उनको जांच से ही हटवा दिया था। अगर सीबीआई के पूर्व ज्वांइट डॉयरेक्टर की माने तो राठौड़ की सीबीआई में खूब चलती थी। बावजूद इसके कि राठौड़ खुद आरोपी थे,जिसके खिलाफ जांच भी सीबीआई कर रही थी, और उनकी यानि एक आरोपी की देश की सबसे बड़ी जांच ऐजेसी सीबीआई मे चलती थी। बक़ौल आरएम सिहं राठौड़ बाक़ायदा उस वक़्त के डॉयरेक्टर से मिले और मुझे यानि जांच अधिकारी को ही हटवा दिया। आरएम सिहं के इस बयान या रहस्योदघाटन से एक बार फिर उन आरोपों को बल मिल गया है कि कई बार सीबीआई निष्पक्ष नहीं रहती। साथ ही उसमे आरोपी के साथ अक्सर साठगांठ के आरोप भी मज़बूत हो रहे है। लेकिन यहां सबसे अहम और ख़ास बात ये है कि सीबीआई के उच्चाधिकारी के खिलाफ एक आरोपी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके जांच को न सिर्फ प्रभावित कर लेता है, बल्कि वो उस जांच अधिकारी को हटवा भी देता है। और जांच अधिकारी पूरे उन्नीस साल तक खामोश रहता है। न तो वो अदालत को ये बताता है कि आरोपी राठौड़ दोषी भी है, और रुचिका के साथ ज़्यादती हो रही है। अगर रुचिका के दोषी राठौड़ हैं तो वो लोग भी हैं जो समय रहते अपनी आवाज़ या सच्चाई को उठा नहीं सके। जब तक रुचिका कमज़ोर थी, तब सब खामोश थे, जब पीड़ित ने लड़ते लड़ते मायूस होकर खुदकशी कर ली, और पीड़ित का परिवार बर्बाद हो गया तब भी किसी की आवाज़ नहीं खुली। सीबीआई के पूर्व ज्वाइंट डॉयरेक्टर आरएम सिंह अगर इस बीच ये राज़ खोलते तो शायद उनकी छवि इतनी संजदेहास्पद न होती।आखिर में अदालत ने इंसाफ को ज़िदा रखते हुए जब राठौड़ को दोषी करार दे दिया तो सब पाला बदल कर रुचिका के हमदर्द बन रहे हैं। यानि द्रोपदी के चीर हरण के लिए जितना दोषी दुर्योधन है उससे कहीं ज़्यादा भीष्म पितामह की वो ख़ामोशी है, जो सत्ताधारी दल और ताक़तवर के खिलाफ मुंह न खोल कर उन्होने रखी थी।
अगर आप भी भीड़ से हटे कर कुछ कह सकते हैं....तो आपकी राय आपकी बात का अपोज़िशन न्यूज़ डॉट कॉम पर स्वागत है।http://oppositionnews.com